इन तीन बड़ी वजहों से बिहार चुनाव में हुआ कांग्रेस का बंटाधार

बिहार चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन ने तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने के अर’मानों पर पानी फेर दिया है. बिहार में मुस्लिम बहुल सीमांचल व ब्राह्मण-यादव बहुल मिथिलांचल कांग्रेस का ग’ढ़ माना जाता था, लेकिन एनडीए की आं’धी में इस बार ये किला भी ढह गया. कांग्रेस 70 में से महज 19 सीटें ही जीत सकी जबकि पिछले चुनाव में 27 सीटें जीती थी. कांग्रेस के बिहार में प्रदर्शन को लेकर पार्टी के अंदर ही सवाल खड़े होने लगे हैं और ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह रही कि कांग्रेस अपने पुराने नतीजे को भी महागठबंधन में रहते हुए नहीं दोहरा सकी?

सीमांचल में कांग्रेस फ्लॉप

सीमांचल कांग्रेस का पुराना और मजबूत गढ़ माना जाता है, यहां की 24 विधानसभा सीटों पर 30 से 70 फीसदी मु’स्लिम मतदाता हैं. कटिहार, अररिया व किशनगंज में मु’स्लिम अहम भूमिका में हैं. यहां के मतदाताओं ने कांग्रेस की बजाय असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को तवज्जो दी, जिसका नतीजा है कि AIMIM पांच सीटें जीतने में सफल रही. किशनगंज सीट पर उपचुनाव में ओवैसी की दस्तक के बावजूद कांग्रेस AIMIM को सीमांचल में का’उं’टर करने में फे’ल रही. यही वजह रही 2015 में सीमांचल की 9 सीटों जीती थी, जिनमें से पांच ग’वां दी है. कांग्रेस के लिए आगे की राह और भी पथ’रीली होने के संकेत मिल रहे हैं.

कटिहार के पूर्व सांसद तारिक अनवर ने सीमांचल में ओवैसी की पार्टी की एंट्री को चे’तावनी का संकेत बताते हुए ट्वीट कर कहा कि कांग्रेस के प्रदर्शन पर मंथन और आ’त्म चिं’तन करने की जरूरत है, कहां चूक हुई है.

AIMIM की बिहार में एंट्री शुभ संकेत नहीं है. यह बिहार के लिए एक खत’रनाक प्रवृत्ति है और कांग्रेस पार्टी के लिए अधिक खत’रनाक है. हमें 10 सीटों पर नु’कसान पहुंचाया है. ऐसे में जरूरत आ’त्म’चिं’तन की है. इसके लिए हमें अपने प्रत्याशियों और जिला व स्थानीय नेताओं से बात करनी चाहिए.

मिथिलांचल में क्यों हारी कांग्रेस

मिथिलांचल में ब्राह्मण और यादव मतदाता निर्णायक भूमिका में है. पूर्व रेलमंत्री ललित नारायण मिश्रा, पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और भागवत झा आजाद जैसे दिग्गजों के चलते मिथिलांचल में कांग्रेस की जयजयकार होती थी. ब्राह्मण बहुल होने के चलते कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था, पिछले चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन यहां ठीक-ठाक था. कांग्रेस अपने कोर वोटबैंक को साधने के लिए कोई रणनीति अपना ही नहीं सकी.

यही नहीं मिथिलांचल के जाले सीट पर ही कांग्रेस ने मसकूर को टि’कट दे दिया, जिनका नाम जि’न्ना विवा’द में रहा. इसके चलते पूरे मिथिलांचल में बहुसंख्यक समाज कांग्रेस के खिला’फ हो गया और एनडीए के पक्ष में ध्रु’वीकरण हो गया.

कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा इसी मिथिलांचल के इलाके से आते हैं और खुद यहां के सियासी माहौल को नहीं समझ पाए. यही कारण है कि हमने मिथिलांचल में इतना खरा’ब प्रदर्शन किया. इसके अलावा यहां नामांकन के दिन टिकट ऐसे लोगों को दिए गए जो पैर’शूट प्रत्या’शी थे या फिर विवा’दित. कांग्रेस ने ऐसे लोगों को उतारा, जो कभी क्षेत्र में इससे पहले आए ही नहीं थे. मिथिलांचल की हार की असल वजह यही बनी.

टिकट वितरण पर खड़े हुए सवाल

बिहार में कांग्रेस ने जिस तरह से बाहरी लोगों को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा था, वो कांग्रेस की हार की असली वजह बनी. इसके अलावा कांग्रेस को तीन दर्जन ऐसी सीटें मिली थीं, जहां 3 दशक से पार्टी कभी नहीं जीती. इनमें नालंदा, वैशाली और मुजफ्फरपुर की सीटें हैं.

कांग्रेस के एक नेता ने बताया कि हम 70 सीटों पर ल’ड़े, लेकिन इनमें से लगभग 27 सीटों पर पार्टी ने लंबे समय तक चुनाव नहीं ल’ड़ा था. ऐसे में कई सीटें ऐसी थी, जो बीजेपी की गढ़ थी. इसके अलावा तीसरे मोर्चे ने भी हमें कई सीटों पर नु’कसान पहुंचाया, जिसमें पप्पू यादव शामिल हैं इसके अलावा चिराग पासवान से भी नु’कसान पहुंचा. ओवैसी से निपटने के लिए हमारे पास कोई रणनीति नहीं थी. यही नहीं एनडीए के मुकाबले कांग्रेस चुनावी प्रचार को भी धा’र नहीं दे सकी.