कृषि कानूनों के समर्थन में अमेरिका, किसान आं’दोलन को लेकर कह डाली ये बात

कृषि कानू’नों पर केंद्र सरकार और किसान सं’गठनों के बीच वि’वाद का ह’ल होता नहीं दिख रहा है। हाल ही में कुछ अंतरराष्ट्रीय सिलेब्रिटीज और कार्यकर्ताओं द्वारा इस मु’द्दे पर बयान दिए जाने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने सख्त लहजे में लोकप्रिय शख्सियतों को तथ्यों की जांच-परख करने की सलाह दे डाली थी।

अब अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कृषि कानू’नों, भारत में चल रहे किसान आं’दोलन और दिल्ली में हुए इंटरनेट शटडाउन पर बयान जारी किया है। इसमें शांतिपूर्ण प्रदर्श’नों को एक सफल लोकतंत्र की पहचान बताते हुए अमेरिका ने बुधवार को कहा कि वह उन प्रयासों का स्वागत करता है जिससे भारत के बाजारों की क्ष’मता में सुधार होगा और निजी क्षेत्र निवेश के लिए आकर्षित होगा।

कृषि कानू’नों का किया समर्थन: अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, ‘‘अमेरिका उन कदमों का स्वागत करता है जिससे भारत के बाजारों की क्षमता में सुधार होगा और निजी क्षेत्र की कंपनियां निवेश के लिए आकर्षित होंगी।’’ प्रवक्ता ने यह संकेत दिया कि बाइडेन प्रशासन कृषि क्षेत्र में सुधार के भारत सरकार के कदम का समर्थन करता है जिससे निजी निवेश आकर्षित होगा और किसानों की बड़े बाजारों तक पहुंच बनेगी।

लगभग दो तिहाई या 65.8 प्रतिशत लोगों ने कहा कि पिछले साल की तुलना में खर्च काफी बढ़ गया है, जबकि 30 प्रतिशत लोगों ने कहा कि खर्च तो बढ़ा है लेकिन लेकिन अभी भी बेका’बू नहीं हुआ है।

‘शांतिपूर्ण प्रदर्श’न सफल लोकतंत्र की पहचान’: भारत में चल रहे किसानों के प्रदर्श’न पर एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका वार्ता के जरिए दोनों पक्षों के बीच मतभेदों के समाधान को बढ़ावा देता है। प्रवक्ता ने कहा, ‘‘हम मानते हैं कि शांतिपूर्ण प्रद’र्शन किसी भी सफल लोकतंत्र की पहचान है और भारत के उच्चतम न्यायालय ने भी यही कहा है।’’

किसान आं’दोलन पर अमेरिकी नेता भी दे चुके हैं बयान: इस बीच, कई अमेरिकी सांसदों ने भारत में किसानों का समर्थन किया है। सांसद हेली स्टीवेंस ने कहा, ‘‘भारत में नए कृषि कानू’नों के खि’लाफ शांतिपूर्ण प्रदर्श’न कर रहे प्रदर्श’नकारियों पर का’र्रवाई की खबर से चिं’तित हूं।’’ एक बयान में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार और प्रदर्श’नकारी किसानों के प्रतिनिधियों को सकारात्मक बातचीत के लिए प्रोत्साहित किया। अन्य सांसद इलहान उमर ने भी प्रदर्शनकारी किसानों के प्रति एकजुटता दिखायी।

किसानों के प्रदर्श’न का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अभी ख’तरे में है। सिख पॉलिटिकल एक्शन कमेटी के अध्यक्ष गुरिंदर सिंह खालसा ने एक अलग बयान में कहा कि ‘‘ऐतिहासिक किसान आं’दोलन भारत सरकार की पूंजीवादी व्यवस्था के खि’लाफ सबसे बड़ी क्रां’ति’’ बनने जा रहा है। वहीं अंतरराष्ट्रीय मु’द्रा कोष (आईएमएफ) ने भी हा’ल ही में कहा था कि भारत के नए कृषि कानू’न में कृषि क्षेत्र में सुधार की दिशा में ‘‘उल्लेखनीय कदम’’ उठाने की क्षमता है।

क्या था भारतीय विदेश मंत्रालय का रुख?: भारत के विदेश मंत्रालय ने किसानों के प्रदर्शन पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया पर बुधवार को क’ड़ी आ’पत्ति जताई थी। भारत ने कहा था कि संसद ने एक ‘सुधारवादी कानू’न’ पारित किया है, जिस पर ‘‘किसानों के एक बहुत ही छोटे वर्ग’’ को कुछ आ’पत्तियां हैं और वार्ता पूरी होने तक कानू’न पर रो’क भी लगाई गई है।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि विरो’ध प्रदर्श’न के बारे में टिप्पणी करने की जल्दबाजी से पहले तथ्यों की जांच-परख की जानी चाहिए। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, ‘‘ खास तौर पर मशहूर हस्तियों एवं अन्य द्वारा सोशल मीडिया पर हैशटैग और टिप्पणियों को सनसनीखेज बनाने की ललक न तो सही है और न ही जिम्मेदाराना होती है।’’ बयान में कहा गया है कि, ‘‘हम इस बात पर जो’र देना चाहते हैं कि इन प्रदर्श’नों को भारत के लो’कतांत्रिक आचार और राज्य-व्यवस्था के संदर्भ में तथा संबंधित किसान समूहों से गतिरो’ध दूर करने के सरकार के प्रयासों के सं’दर्भ में देखा जाना चाहिए।’’

क्या है किसानों की मांग?: बता दें कि कृषि कानू’नों को निरस्त करने, फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानूनी गारंटी देने तथा दो अन्य मु’द्दों को लेकर हजारों किसान दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर ड’टे हुए हैं। इस साल सितम्बर में अमल में आए तीनों कानू’नों को भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार के तौर पर पेश किया है। उसका कहना है कि इन कानूनों के आने से बिचौ’लिए की भूमिका ख’त्म हो जाएगी और किसान अपनी उपज देश में कहीं भी बेच सकेंगे। दूसरी तरफ, प्रदर्श’न कर रहे किसान संगठनों का कहना है कि इन कानू’नों से एमएसपी का सुरक्षा कवच ख’त्म हो जाएगा और मंडियां भी ख’त्म हो जाएंगी तथा खेती बड़े कारपोरेट समूहों के हाथ में चली जाएगी।